पृथ्वी Kab’an बीस दिन-चिह्नों में सत्रहवाँ है, उल्लू Kib’ के बाद: अँधेरे में देखने के बाद, ज़मीन पर लौटकर धीरे-धीरे हिलना। Kab’an का अर्थ “धरती” है, “भूकंप” भी, और “ज्ञान, विचार” भी — तीनों को साथ रखें तो यही इसका तंत्र है: विचार धरती की परत जैसे हैं, आम तौर पर नहीं हिलते, हिलें तो पूरा हिस्सा साथ हिलता है। माया लोग इसे बुद्धि, ऋतुओं और समय की गहरी लय से जोड़ते थे।
इसलिए Kab’an का तंत्र है गहरा चिंतन और दिशा-परिवर्तन: सोचने में समय लगता है, क्योंकि आप सतह नहीं, तल को हिला रहे होते हैं; तल एक बार मुड़ जाए तो ऊपर का सब साथ मुड़ता है, और वापस मनाना मुश्किल होता है। इसकी ताक़त ठोसपन है — आपके निष्कर्ष टिकते हैं; कठिनाई धीमापन और सख़्ती है — दूसरे इंतज़ार नहीं कर पाते, या मुड़ने के बाद आप कुछ सुन नहीं पाते।
आप इसे कहाँ पहचानेंगे: सोच को पकने का समय चाहिए, ज्ञान और समझ में गहरी रुचि, जल्दी मचाई जाए तो झुँझलाहट, राय बदलना मुश्किल पर बदले तो पूरी तरह, प्रकृति और ज़मीन से जुड़ाव। अनुकूल समय में आप सबसे समझदार नींव हैं: पूरी तरह सोचते हैं, मज़बूती से टिकते हैं, लोगों को ऐसा आधार देते हैं जो बहता नहीं। अटके समय में जकड़न या झटका — हिलने से इनकार, या बहुत देर दबाए रखकर एक बार में ढह जाना। क्रम में Kab’an के बाद चकमक Etz’nab’ आता है: ज़मीन हिल चुकी, अब काटना है। आपका अगला क़दम एक बार और सोचना नहीं, जो समझ आ गया उसे एक ऐसे वाक्य में कहना है जिस पर अमल हो सके।