हाँ कहने से पहले ख़ुद से पूछिए कि क्या सचमुच मन है — मजबूरी में किया वादा सबसे पहले आपसे ही नहीं निभता।
आप करेंगे या नहीं, यह विश्लेषण से नहीं, मन होने या न होने से तय होता है। मन हो, तो ताक़त आ जाती है।
हाँ कहने से पहले ख़ुद से पूछिए कि क्या सचमुच मन है — मजबूरी में किया वादा सबसे पहले आपसे ही नहीं निभता।
अक्सर इसे “ज़िद्दी, मनमौजी” कहा जाता है। आप ग़ैरज़िम्मेदार नहीं, बस वे वादे आपसे नहीं निभते जिन्हें मन से चाहा ही नहीं। अंत में टूटने तक खिंचने से बेहतर है जल्दी ईमानदार होना, इससे दोनों पक्षों के लिए समेटना आसान होता है।