मेष राशिचक्र की पहली राशि है, और इसकी शुरुआत वसंत विषुव से होती है — जब दिन पहली बार रात से लंबा होता है। पूरी राशि का स्वभाव इसी जगह से निकलता है: शुरुआत में कोई संचय नहीं जिस पर टिका जाए, इसलिए मेष शुद्ध आरंभ-शक्ति पर चलता है; शुरुआत में कोई अनुभव नहीं जिसे देखा जाए, इसलिए उसे पहले करना और फिर सुधारना पड़ता है। यह लापरवाही नहीं, जगह से तय हुई रणनीति है।
आप इसे यहाँ पहचानेंगे: सोच पूरी होने से पहले ही आपका शरीर चल पड़ता है, और बाद में देखें तो वह सहज बोध जितना आप सोचते हैं उससे ज़्यादा बार सही निकला; इंतज़ार आपके लिए ऊब नहीं, थकान है; आपको ग़ुस्सा जल्दी आता है और जल्दी उतर भी जाता है — दूसरे जब तक मन में बात रखे बैठे हैं, आप भूल चुके होते हैं।
अनुकूल समय में मेष वह है जिसे देखकर लोग कहते हैं “आख़िर कोई तो हिला”: जब पूरा समूह अटका हो, आपकी मौजूदगी ही हल होती है। अटके समय के दो रूप हैं। एक, रफ़्तार ग़लत दिशा में लगाना — क्योंकि रुककर दिशा जाँचना दौड़ते रहने से ज़्यादा चुभता है; दूसरा, कई काम शुरू करना पर किसी को न सँभालना, क्योंकि सँभालने के लिए बिल्कुल अलग ऊर्जा लगती है। मेष के लिए अभ्यास धीमा होना नहीं, बल्कि दौड़ शुरू होने के बाद कोई सँभालने वाला ढूँढना है: आपकी क़ीमत शून्य से एक तक है; ज़बरदस्ती दस तक खींचना बस आपकी ख़ूबी घिसता है।