विशाखा सोलहवाँ नक्षत्र है, इसका स्वामी गुरु है, प्रतीक विजय-द्वार (दो शाखाओं वाली टहनी भी), और देवता इंद्राग्नि: इंद्र और अग्नि एक साथ, विजय और आग के दो देवता मिलकर। नाम का अर्थ है “शाखाओं वाला”।
तंत्र की दृष्टि से गुरु विस्तार और अर्थ है, इंद्र विजय, और अग्नि चीज़ों को जलाकर ऊर्जा बनाना। मिलाकर: एक लक्ष्य की ओर जलना। दो शाखाओं का चित्र इस नक्षत्र की मुख्य क्रिया बताता है: सामने दो राहें हैं, एक चुननी है, और फिर पूरी आग उसी में झोंकनी है। विजय-द्वार सही चुनने के बाद का रूप है; न चुनें, या चुनकर लौट आएँ, तो आग बिखर जाती है।
इसे आप कहाँ पहचानेंगे: लक्ष्य का तीव्र बोध, एक चीज़ के लिए देर तक सहना, उपलब्धि की भूख, डरावनी एकाग्रता, पहुँचने के बाद थोड़ा ख़ालीपन, और जब दोनों राहें चाहिए हों तब अटक जाना। सहज चलने पर आप सबसे ज़्यादा निभाने वाले हैं: तय किया तो अंत तक गए, लंबे काम पूरे किए, लोग आपके साथ जूझना चाहते हैं। अटकने पर लक्ष्य आपको खा जाता है: पाने के चक्कर में प्रक्रिया खो देना, पहुँचने के बाद अगला न मिलना, या दोराहे पर इतनी देर खड़े रहना कि दोनों ओर ठंडा पड़ जाए। पहले स्वाति हवा है, बाद में अनुराधा साथी: एक दौर जूझने के बाद पता चलता है कि अकेले जीतना उतना दिलचस्प नहीं।