हाँ कहने से पहले अपनी ताक़त तौल लीजिए। निभा न पाना चरित्र की कमी नहीं, बोझ ज़्यादा हो जाना है।
यह केंद्र वादे और मूल्य का है — हाँ कहने की हिम्मत है या नहीं, ख़ुद को योग्य मानते हैं या नहीं।
हाँ कहने से पहले अपनी ताक़त तौल लीजिए। निभा न पाना चरित्र की कमी नहीं, बोझ ज़्यादा हो जाना है।
अक्सर इसे “इच्छाशक्ति कितनी मज़बूत है” समझ लिया जाता है। यह नैतिकता का प्रश्न नहीं। वादा करके न निभा पाना अक्सर इसलिए होता है कि शुरू से ही उसके पीछे वह ईंधन नहीं था — इसलिए नहीं कि आप बुरे इंसान हैं।