“आख़िर मुझे किस ओर जाना है” — जब यह सवाल उठता है, तो यही केंद्र बोल रहा होता है। यह ज़्यादा सोचना नहीं है।
यह केंद्र दिशा और आपकी पहचान का है — प्रेम, आप कौन हैं, आगे किस ओर जाना है।
“आख़िर मुझे किस ओर जाना है” — जब यह सवाल उठता है, तो यही केंद्र बोल रहा होता है। यह ज़्यादा सोचना नहीं है।
अक्सर इसे “जीवन का लक्ष्य खोजना” समझ लिया जाता है। यह दिशा देता है, मंज़िल नहीं। दिशा मुड़ती है; मुड़ने का मतलब यह नहीं कि आप भटक गए, बस रास्ता बदल गया।